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मुहब्बत का फ़र्ज़ न निभा पाओगे. ....कुछ आश्यार

>> Thursday, May 8, 2008

मुहब्बत का फ़र्ज़ न निभा पाओगे,
गर रूठ गया कोई तो न मना पाओगे,
ये मुहब्बत नही है बोझ है काँटों का,
ज्यादा देर तलक ऐ दोस्त इसको न उठा पाओगे।

हो जायेंगे छलनी ये पैर यूँही चलते चलते,
ये गरम पत्थरों का रसता है तुम भी झुलस जाओगे।

यूं तो होता है असर दुआओं में भी सुना हमने भी है,
मगर जब माशूक को ख़ुदा कहोगे तो ख़ुदा को क्या मुँह दिखाओगे।

हज़ारों ग़म हैं इस इश्क में समझा रहा हूँ मैं,
क्या मेरे पाँव के छालों से कुछ सबक न पाओगे।

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